सेवा धर्म Swami Vivekananda Inspiring Stories. 

एक साधु स्वामी विवेकानन्द जी के पास आया । अभिवादन करने के बाद उसने स्वामी जी को बताया कि वह उनके पास किसी विशेष काम से आया है ।

“स्वामी जी, मैने सब कुछ त्याग दिया है, मोह माया के बंधन से छूट गया हूँ परंतु मुझे शांति नहीं मिली । मन  सदा भटकता रहता है ।

एक गुरु के पास गया था जिन्होंने एक मंत्र भी दिया था और बताया था कि इसके जाप से अनहदनाद सुनाई देगा और फिर शांति मिलेगी । बड़ी लगन से मंत्र का जाप किया, फिर भी मन शांत नहीं हुआ।अब मैं परेशान हूँ।”

इतना कहकर उस साधु की आँखे गीली हो गई ।

“क्या आप सचमुच शान्ति चाहते हैं”, विवेकानन्द जी ने पूछा ।

बड़े उदासीन स्वर में साधु बोला , इसीलिये तो आपके पास आया हूँ ।

स्वामी जी ने कहा,”अच्छा, मैं तुम्हें शान्ति का सरल मार्ग बताता हूँ । इतना जान लो कि सेवा धर्म बड़ा महान है । घर से निकलो और बाहर जाकर भूखों को भोजन दो, प्यासों को पानी पिलाओ, विद्यारहितों को विद्या दो और दीन, दुर्बल, दुखियों एवं रोगियों की तन, मन और धन से सहायता करो ।

सेवा द्वारा मनुष्य का अंतःकरण जितनी जल्दी निर्मल, शान्त, शुद्ध एवं पवित्र होता है, उतना किसी और काम से नहीं । ऐसा करने से आपको सुख, शान्ति मिलेगी।”

साधु एक नए संकल्प के साथ चला गया । उसे समझ आ गयी कि मानव जाति की निः स्वार्थ सेवा से ही मनुष्य को शान्ति प्राप्त हो सकती है ।

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